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फतेहपुर (संवाददाता -रवीन्द्र अवस्थी )  यू. पी. के फतेहपुर जिले में देवरी बुजुर्ग (देवपुरी प्राचीन नाम ) एक ऐसी जगह है -जहां पर 30 नवम्बर से रामलीला का मंचन होना है| सुनने में यह बात भले ही अटपटी लगती है, लेकिन यह  सच है कि - फतेहपुर जिले में देवरी बुजुर्ग (देवपुरी) का अति प्राचीन एवं ऐतिहासिक मेला वा रामलीला इन दिनों आने वाला है । इस मेले की खासियत है कि - ये मार्गशीर्ष मास चतुर्थी के दिन से शुरू होता है,और उसके बाद यहां दस दिवसीय रामलीला होती है । यहां पर  रामलीला मनाने की परंपरा लगभग सहस्त्र वर्षों (1000) से चली आ रही है । यह रामलीला पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है । जो मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर, मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की द्वादशी तक चलती है । यहां एक माह तक कुशल कारीगरों द्वारा कास्ट एवं तिनरई से विशालकाय, रावण व रामदल के स्वरूपों का निर्माण किया जाता है । एक खासियत यह भी है कि-आज तक यहां पर कोई बाहरी कारीगर नहीं आया है|सारा काम गाव के हर  समुदाय के लोग बहुत ही श्रद्धा से साथ करते है  पंचवटी, चित्रकूट, सबरी आश्रम, किष्किंधा पर्वत, अशोक वाटिका सेतुबंध रामेश्वर और लंका का स्वरूप भी तैयार किया जाता है । मेले की शुरुआत गणेश पूजन के साथ होती है । रावण वध के बाद यहां पर राम जी की विजय की खुशी पर मिठाई बाटी जाती है| हर करीगर वा गांव के लोग प्रसाद लेते है । इन रस्मों को देखने यहां दूर-दराज से लोग आते हैं । मेले में छोटी-बड़ी लगभग दो दर्जन झांकियां सजाई जाती हैं । राम-रावण युद्ध के दिन, लाखों की तादाद में लोग जुटते हैं  । इसमें प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी शामिल होते हैं  । इस रामलीला की चर्चा फतेहपुर जिले में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत में होती रही है । मेला कमेटी के अध्यक्ष श्री अशोक चन्द्र बाजपेई जी ने बताया कि यहां का मेला देखने लाल बहादुर शास्त्री जी आ चुके हैं । ऐतिहासिक परिचय सुनकर लोग चकित रह जाते हैं हालांकि शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते इस गांव की साख दिन-प्रतिदिन खत्म हो रही है । बिंदकी तहसील से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर खजुहा अमोली मार्ग पर 


स्थित देवरी बुजुर्ग (देवपुरी) में आन्नदी माता मंदिर सूबेदार जी का हनुमान मंदिर और माखन मंदिर कई सारे मंदिर और तालाब सब ठीक उसी तरह है, जैसे की रामलीला मंचन होता है | सब की अलग अलग भूमिका रहती है  । बहुत सारे तालाब है, गांव में मंदिरों की बहुत संख्या है ,हमारे पड़ोसी गांव भी अपना पूरा सहयोग प्रदान करते है  । जिसमें छोटी देवरी सहिमलपुर अर्गल इसमें पूरा सहयोग प्रदान करते हैं । प्राचीन सांस्कृतिक नगरी में २१ छोटे-बड़े शिवालय तथा इतने ही कुएं हैं । चार विशालकाय तालाब इस गांव की चारों दिशाओं में शोभायमान है । जो इस ग्राम के स्वर्णिम युग की याद दिलाते हैं । प्रदेशी पर्यटक आज भी इस गांव की प्राचीन धरोहरों को देखने आते हैं । जिसमें की हमारी सबसे बड़ी धरोहर है हमारे स्वरूपों श्री राम श्री लक्ष्मण माता जानकी जी के चांदी के प्रचीन मुकुट जो  मेले की शोभा बढ़ाते हैं और  हमारे मेले में जो स्वरुप बनाए जाते है, वो ब्राम्हण बालक  उपनयन संस्कार से निवृत्त होते है  । ये मुकुट और स्वरूपों के श्रंगार का सामान ठाकुर द्वारा में ही रहता है । जो कि हमारे गांव के लोग ही श्रंगार करते है, श्रंगार रोज होता है । श्रंगार को करने में 3 घण्टे का समय लगता है भी बहुत बारीक कलाकारी करनी पड़ती हैं  । जिसमें की सजाते सजाते ईश्वर का रूप ही आ जाता हैं फिर स्वरूपों को राजसी पहनावे के साथ रजात्मुकुट धारण करवाकर माली के बुने फूलों की माला पहनाकर आरती करके मंचन के लिए तैयार करते है  हमारी कला यहीं समाप्त नहीं होती है। अब मेले में काठ के अद्भुत कलाकारी के द्वारा रावण मेघनाद के स्वरुप तैयार किए जाते है जिसमें रावण के दस सिर दशानन बनाया जाता है । भगवान राम लक्ष्मण के  लिए काठ के दो घोड़े एवं पूरी राम दल सेना का भी अविश्वसनीय निर्माण गांव के लोग ही करते है । जिसमें की सुग्रीव अंगद हनुमान नल नील केशरी गरुण की मूर्तियां होती है देखने में विश्वास है होता की ये सीधे स्वर्ग से धरा पर आई है । राम चन्द्र जी के लिए एक पुष्पक विमान होता है जो कि वो भी काठ का ही बना होता है  । उसकी रचना तो हम बाया हि नहि कर सकते अपने शब्दो से वो तो मानों की किसी ईश्वरी कृपा से ही बनता है । उसके एक एक फूलों में राम बसते है, विमान में आधुनिकता भी दी जाती हैं । इलेक्ट्रॉनिक लाइटों द्वारा साउंड से ऐसे गाने बजते है, जिसमें नाम मोह जाता है ।

रावण दल में युद्ध के समय आतिशबाजी का नाजारा भी दर्शनीय होता है| जो कि लगातार युद्ध के साथ चलती रहती हैं । युद्ध में राम दल विजय प्राप्त करता है, फिर हम ग्रामवासी विमान को पैदल  खीचते हुए ले जाते है, उसमे विजयी भगवान रामेश्वरम में रात बिताने के बाद सुबह ३बजे गांव की ओर निकलते है । उस विमान में राम दल की सेना भी होती हैं।  ग्रामवासी पूर्वजों की लिखी हुई भजनीय पुस्तक से भजन करते हुए विमान को खीच कर ले जाते है । विमान पूरे गांव का भ्रमण करता है। हर घर से माताए बहने बच्चे भगवान को देखने के लिए आतुर रहते है । हर घर से भगवान का तिलक किया जाता है फिर ठाकुर द्वारा तक यही क्रम रहता है। लगभग दोपहर के 1बजे पहुंचते है ठाकुर द्वारा । फिर अगले दिन भरत मिलाप होता है, राजतिलक को करके हवन के बाद समाप्त करते है। मेला हमारा बराबर चलता रहता है, जिसमें क्षेत्र की बहुत सी दुकाने लगती है । बर्तन रोज मर्रा की चीजे जूते खिलौने पुस्तक और मीना बाजार सजता है। मेले में जलेबी केला मूंगफली मशहूर रहती है। खाने का बहुत सी दुकानें झूले सर्कस सब मिलते है, मेले में ।

साभार - श्री अशोक चन्द्र  वाजपेयी


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