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मार्गशीष कृष्ण अष्टमी को कालभैरवाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। मार्गशीष अष्टमी को मध्यान्ह के समय भगवान शिव ने काल भैरव के रूप में अवतार लिया था। अष्टमी तिथि 19 नवम्बर को दिन 03ः35 मिनट से प्रारम्भ होकर 20 नवम्बर को दिन 01ः41 तक रहेगी। काल भैरव भगवान शिव का रौद्र, विकराल एवं प्रचण्ड स्वरूप है। इसदिन भैरव जी के साथ शिव और मां पार्वती की भी पूजा की जाती है।भैरव अवतार प्रदोष काल यानी दिन-रात
के मिलन की घड़ी में हुआ था। इसीलिए भैरव पूजा शाम और रात के समय करना ज्यादा शुभ माना गया है। काल भैरव अष्टमी पर स्नान के बाद किसी भैरव मंदिर जाएं। सिंदूर, सुगंधित तेल से भैरव भगवान का श्रृंगार करें। लाल चंदन, चावल, गुलाब के फूल, जनेऊ, नारियल अर्पित करें। तिल-गुड़ या गुड़-चने का भोग लगाएं। सुगंधित धूप बत्ती और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इसके बाद भैरव मंत्र का जाप करें। भैरव जी का वाहन श्वान (कुत्ता ) है।  कुत्ते को पूएं खिलाना चाहिए। भैरव जी को काशी का कोतवाल माना जाता है। भैरव के पूजा से राहु ग्रह भी शान्त हो जाते है  बुरे प्रभाव और शत्रु भय का नाश होता है

- ज्योतिषाचार्य-एस.एस.नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ

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