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यह त्यौहार माघ के कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है  इसे तिलकुटा चौथ भी कहते है। सकट चौथ व्रत संतान की लम्बी आयु के लिये किया जाता है। इस दिन संकट हरण गणपति गणेशजी का पूजन होता है। पूजा में दूर्वा, शमी पत्र, बेल पत्र, गुड़ और तिल के लडडू चढ़ाये जाते है। यह व्रत संतान के जीवन में विध्न बाधाओं को दूर करता है संकटों तथा दुःखों को दूर करने वाला और रिद्धि-सिद्धि देने वाला है। प्राणीमात्र की सभी इच्छाएं व मनोकामनाएं

भी इस व्रत के करने से पूरी हो जाती है। महिलाए  निर्जल व्रत रखकर शाम का फलाहार लेती है और दूसरे दिन सुबह सकट माता पर चढ़ाए गए पूरी-पकवानों को प्रसाद रूप में ग्रहण करती है। शाम को चन्द्रोदय के समय तिल, गुड़ आदि का अध्र्य चन्द्रमा को दिया जाता है। तिल को भूनकर गुड़ के साथ कूट लिया जाता है। तिलकुट का पहाड़ बनाया जाता है। कहीं-कहीं तिलकुट का बकरा भी बनाया जाता है। उसकी पूजा करके घर का कोई बच्चा तिलकुट बकरे की गर्दन काट देता है। फिर सबको उसका प्रसाद दिया जाता है। पूजा के बाद सब कथा सुनते है। 13 जनवरी को चन्द्रोदय रात 08:21 पर होगा।


- ज्योतिषाचार्य एस0एस0 नागपाल , स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ

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